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एक दिवस असाच एकांतात बसलो
बघता बघता अचानक आठवनींत फसलो

सर्वात पहिल आठवल ते माझ सुंदर बालपन
संसकाराचे बाळकडू घेताना मीळालेलं शहानपन

शाळेत जायला लागलो तेव्हाचे ते बोबडे बोल
आजूनहि आठवतात जसे हृदयात दडलेत खोल

बघता बघता शाळेच्या इयत्ता बदलत गेल्या
मूले सगळी तीच पण बाई बदलत गेल्या

मग खरा सुरू झाला भविष्याचा खेळ
दहाविच्या आभ्यासात विरगळुन गेला वेळ

कॉलेजमद्दे गेलो तेव्हा नविन मीञ बनले
मीञांच्या गप्पांमद्दे माझे ते दिवस सरले

कॉलेजमद्दे एकदा प्रितीची लाट उसळली
तीची माझी पहिलीच भेट प्रेमामद्दे मीसळली

पुस्तकाप्रमाने हळु हळु सारेच पलटून गेले
जसे एखादे फुलपाखरू हातात रंग ठेवून गेले

कविकुमार:-9970030091

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