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मराठी गझल ( Marathi Gazal )
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केव्हातरी पहाटे उलटून रात्र गेली 
मिटले चुकून डोळे हरवून रात्र गेली

कळले मला न केव्हा सुटली मिठी जराशी
कळले मला न केव्हा निसटून रात्र गेली

सांगू तरी कसे मी वय कोवळे उन्हाचे?
उसवून श्वास माझा फसवून रात्र गेली!

उरले उरात काही आवाज चांदण्याचे..
आकाश तारकांचे उचलून रात्र गेली!

स्मरल्या मला न तेव्हा माझ्याच गीतपंक्ती
मग ओळ शेवटाची सुचवून रात्र गेली!

आता कुशीत नाही ती चंद्रकोर माझी..
हलकेच कूस माझी बदलून रात्र गेली

अजुनी सुगंध येई दुलईस मोगऱ्याचा..
गजरा कसा फुलांचा विसरुन रात्र गेली?

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मराठी गझल ( Marathi Gazal )
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